Tuesday, 25 September 2012

जरुरत राजसत्ता पर नकेल की न की राजनितिक दल

केवल चुनाव नहीं है लोकतंत्र जो बात काफी समय से चर्चा में थी अब औपचारिक तौर पर उसकी पुष्टि हो गई है। अन्ना हजारे ने अरविंद केजरीवाल की प्रस्तावित राजनीतिक पार्टी से खुद को अलग करते हुए साफ किया है कि नया दल उनके नाम का इस्तेमाल नहीं करेगा। उन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन की ओर से इस बारे में कराए सर्वे को भी खारिज कर दिया कि बहुमत नया दल बनाने का पक्षधर है। अन्ना एक गैर-राजनीतिक आंदोलन कर रहे थे, जिसमें सिविल सोसाइटी का सम्मोहक चेहरा सामने आया कि जनता सरकार को घुटने टेकने को विवश कर सकती है। अन्ना का नैतिक बल और गैर-राजनीतिक होना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसका आम लोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। आम जनमानस ऐश्वर्य चमक-दमक से थोडे़ समय के लिए प्रभावित जरूर हो जाता है, लेकिन अभिभूत सत्य और नैतिकता से ही होता है। इसलिए केजरीवाल की टीम को अन्ना की नैतिक आभा का व्यापक लाभ मिला। उन्हें गांधी के रूप में प्रचारित किया गया। मनीष सिसोदिया ने लिखा कि आज की पीढ़ी गर्व से कह सकती है कि उसने गांधी को नहीं देखा है, लेकिन अन्ना उसके सामने हैं। विडंबना यही है कि अन्ना को गांधी के रूप में प्रचारित करने वाले गांधी का मूल मंत्र नहीं सीख पाए कि जनता सार्वभौम है और राजसत्ता पर लोकसत्ता का नियंत्रण होना चाहिए, क्योंकि राजसत्ता में भ्रष्ट होने की स्वाभाविक प्रवृति होती है। इसीलिए स्वाधीनता संग्राम का सफल नेतृत्व करने के बाद उन्होंने सत्ता के शीर्ष पर बैठने की जगह लोगों के बीच काम करने का चुनाव किया। यह विश्व की अभूतपूर्व घटना थी, जब क्रांति का नेता सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार का मुखिया न बना हो। जब दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था उस वक्त गांधीजी बंगाल में सांप्रदायिक दंगे की आग को बुझाने में लगे थे। डोमिनिक लैपियर्स एवं लैरी कॉलिंस ने फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है कि 15 अगस्त की रात गांधीजी कलकत्ता के जिस अतिथिगृह में रात्रि विश्राम कर रहे थे वहां बिजली नहीं थी और मोमबत्ती भी नहीं जल रही थी। गांधीजी के ही विचार को लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आगे बढ़ाया कि लोकतंत्र में लोक तंत्र से बड़ा होता है। दुर्भाग्य से चुनाव को ही लोकतंत्र समझ लिया गया है। लोकतंत्र यानी पांच साल में एक बार मतदान का अधिकार। सरकार अक्सर आंदोलनकारियों को चुनाव लड़ने की चुनौती देती है। राजनीतिक पार्टी बनाने की अपनी मंशा जाहिर कर केजरीवाल ने सिविल सोसाइटी की भूमिका को न सिर्फ नकार दिया, बल्कि वही कर दिया जैसा कि सरकार चाहती थी। अब तो कोई भी आंदोलन होगा तो सरकार तपाक से प्रहार करेगी कि इतना जनसमर्थन है तो चुनाव लड़कर आ जाओ। अपने देश में पार्टियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन किसी भी दल में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, परिवारवाद हावी है और सच बोलने की मनाही है। क्या नई पार्टी में इस तरह की खामियां नहीं होंगी? सत्ता का मद व्यक्ति को मगरूर और भ्रष्ट करता है। इसीलिए सिविल सोसाइटी की एक अहम भूमिका है। विश्व इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे जब क्रांति का नेता सत्ता पाकर उन्हीं बुराइयों का शिकार हो गया जिनके विरुद्ध क्रांति की गई थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है फ्रांसीसी क्रांति। उस क्रांति की परिणति राजतंत्र की समाप्ति में हुई, जब वहां के अंतिम सम्राट लुई 16वें और साम्राज्ञी मेरी एंट्वायनेह को फांसी दे दी गई, लेकिन जब रॉविस पियर ने सत्ता की कमान संभाली तो आतंक का राज शुरू हुआ और बड़ी संख्या में लोगों को फांसी दे दी गई, क्योंकि सत्ता में तुरंत बैठे लोगों का मानना था कि कई लोगों ने क्रांति का विरोध किया और इस कारण उन्हें खत्म कर दिया जाना चाहिए। इसकी भी परिणति खुद रॉविस पियर की फांसी में हुई। इसी समय नेपोलियन का उदय हुआ, जिसने गणतंत्रीय फ्रांस को एक संविधान और कानून दिया, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसने खुद को राजा घोषित कर दिया, जबकि क्रांति ही राजतंत्र के खिलाफ शुरू हुई थी। उस समय प्रथा यह थी कि पोप सम्राट को राजमुकुट पहनाता था। नेपोलियन ने भी पोप को ऐसा करने को कहा। राज्याभिषेक के लिए एक समारोह हुआ। इसमें पोप मुकुट लेकर खड़े थे, लेकिन नेपोलियन ने उनके हाथ से मुकुट झपटकर अपने सिर पर रख लिया। यानी राजा बनने की ऐसी छटपटाहट थी कि दो मिनट का सब्र वह नहीं रख पाए। बाद में वह अपना राजवंश चलाना चाहते थे, लेकिन वाटरलू में शिकस्त खाने के बाद इंग्लैंड ने उन्हें गिरफ्तार कर एटलांटिक समुद्र के सेंट हेलेना द्वीप पर भेज दिया, जहां कुछ सालों बाद उनकी मौत हो गई। फ्रांसीसी क्रांति राजशाही के विरुद्ध शुरू हुई थी, जब रूसो ने विचार रखा कि सार्वभौम सत्ता सम्राट में नहीं, बल्कि जनरल विल में होती है। यह बात दीगर है कि रूसो भी जनरल विल को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं कर पाए, लेकिन इसका सामान्य अर्थ जनता ही है। फ्रांस अकेला ऐसा उदाहरण नहीं है। अफ्रीका के कई देशों में ऐसा हुआ। लीबिया में कर्नल गद्दाफी राजा को हटाकर सत्ता में आए, लेकिन सोने के पलंग पर सोने लगे। उनकी निरंकुशता की कहानी जगविदित है। क्यूबा में फिदेल कास्त्रो क्रांति के बाद सत्ता में आए तो पद से चिपके रहे और स्वास्थ्य कमजोर हो गया तो अपने भाई को उन्होंने पद दे दिया। राजसत्ता पतनोन्मुख होती है। लोकतंत्र में प्रतिनिधि कई बार लोकहित के विरुद्ध काम करते हैं। इसलिए जरूरत है जीवंत सिविल सोसाइटी की, जो राजसत्ता पर नकेल कस सके। अरविंद केजरीवाल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा हासिल करने के लिए अन्ना को जरिया बनाना चाहते थे। अन्ना इस रणनीति को समझ गए। वह पहले भी समझ सकते थे, लेकिन केजरीवाल की टीम उन्हें किसी से मिलने नहीं देती थी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) साभार : दैनिक जागरण

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